क्यो कुछ रीश्तों को यूं तोड़ दिया जाता हैं,
जिनके हिस्से मैं ना आगाज न अंजाम आता हैं,
क्यों कुछ रिश्तो को यूं तोड़ दिया जाता हैं!
आज सोचता हूँ तो असमंजस से भरा हूँ मैं,
ये कौन सा रिश्ता था तुमसे जिस से यूं बंधा था मैं,
तुम ही थी बस इस जोड़ने वाली,
बस यूं ही कुछ कदम ही साथ चला था मैं,
फ़िर भी क्यों बैचैन हूँ,
क्यों अपनी रातों की नींद से महरूम हूँ
क्यों रहता है सिर्फ़ तुम्हारे ख़याल दिल ओ दिमाग मैं,
क्यों हर लम्हे तुम्हे याद करता हूँ!
क्यों मेरी जिंदगी से ये दर्द नही जाता हैं,
क्यों कुछ रिश्तो को यू तोड़ दिया जाता हैं
जिनके हिस्से मैं न आगाज न अंजाम आता हैं,
मैं नही जानता की मैं तड़प रहा हूँ
या तुम तड़पा रही हो मुझ्र,
ख्याल हैं तो बस इतना की,
तुम बहुत याद आ रही हो मुझे,
एक बार मुआफी मांग लेना चाहता हूँ ,
क्यों बात ना करके, सता रही हो मुझे,
जानता होता खता अपनी तो सुधार लेता,
बिना इल्जाम लगाए क्यों रुला रही हो मुझे,
जानता हूँ नही मरूँगा इश्क मैं तुम्हारे,
पर बिन तुम्हारे रहा भी तो नही जाता हैं,
क्यों कुछ रिश्तों को यूं तोड़ दिया जाता हैं,
जिनके हिस्से मैं न आगाज न अंजाम आता हैं