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Friday 9 January, 2009
By  amit Tyagi   22:53 | 4/Feb/2008 |  1 Comment(s)
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ye kya ho gaya hun main

सब कुछ मेरा हैं,
ये लगता था मुझे,
जब छिना मुझसे तो जाना मैंने
कि कुछ भी मेरा नही था,

मैं जितना चाहता था तो,
चाहिऐ थी मुझे महनत करनी,
चाहिऐ था उठा सकता फ़ायदा
मिले हुए सब मौकों का

चाहता था मीठी बातें कहूँ,
मीठा मीठा कुछ बोलूं लोगो से,
par अन्दर कि कड़वाहट कह न paati कुछ भी मीठा,
खो देता उनको जो करीब आते थे,
उठा न पता बोझ उनकी नाज्दिकियों का,


वक़्त गवाह रह हैं कि कोई साथ न रह मेरे
कुछ महीनों से ज्यादा
मैं दूर होता चला गया,
जैसे जिंदगी दूर होती जाती हैं,
हर बीते लम्हे के साथ,
जैसे पल पल मिल कर बनाते हैं जिंदगी का ताना बाना
मैं पल पल जोड़ता हुआ तोड़ता जाता हूँ,

क्या कहूँ कहना बेमाने लगता हैं
मेरा रिश्ता बस मुझे से ही जुड़ता हैं
मैं खुश सा हूँ खुद के साथ,
क्यूंकि मैं सह नही पता किसी के शब्दों को,
मैं कह भी नही पता शब्दों को,

आज कल तो काले साले से अक्षर भी
किताबों मैं छपे हुए से,
कोई आकृति नही बनती आखों मैं,
कोई इमोशन नह्ज जुड़ता इस दिल से
वो काले अक्षर देखे हुए बिता हैं एक अरसा
रंगीन चीजे देखने का कुछ यूं आदी हो गया हूँ

मैं क्या था अब मैं क्या हो गया हूँ

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